Thursday, June 18, 2009


अभी एक दिन खंडाला जाने का मौका मिला..... हम दो ही लोग थे जाने वाले...सफ़र की शुरुआत पुणे की लोकल ट्रेन से हुई..कार्ला की गुफाये देखने गए......गुफ़ायें एक पहाड़ी को काट के बनाई गयीं हैं...नीचे कि तसवीर, पारम्परिक "बुलबुल सितार" पर गाते हुऐ एक लोक गायक कि है......

Tuesday, May 19, 2009

तू और मैं......

तू और मैं,
जैसे समनांतर रेखायें,
जो, इक तल में,
और इक ही तो दिशा में,
चलती है,

हाँ,


नदी के किनारे भी तो साथ ही चलते है,
अपने आंचल मैं,
लहरों को भरते है,


पर,


कुछ बात अलग सी है,
कुछ तो इनकी दूरी भी तो है,
समान रास्तों से,
मनज़िलें कहां मिलती है,




वैसे भी,

समनांतर रेखायें कभी नही मिलती है।।



(c)तुम्हारे मन की...जो मैने कही...

Friday, May 15, 2009

इस मन को लुभाये जाती हैं..........

...वो नीम का पेड़,
और बचपन कि यादें,
आज फ़िर से ना जाने क्यों,
इस मन को लुभाये जाती हैं,


नीम और उसके सफ़ेद फ़ूल,
मिट्टी कि खुशबू,
छत पर भरी दुपहरी का जोर,
उस पर हाथ मैं पतंग कि डोर,
इस मन को लुभाये जाती हैं,


वो तितली कांटों के पर क्यों,
पीले फ़ूल इतने पीले कैसे,
बारिश इतनी मीठी क्यों,
ये सवाल अब क्यों नहीं होते,


...वो नीम का पेड़,
और बचपन कि यादें...


(c)तुम्हारे मन की...जो मैने कही...

Thursday, April 16, 2009

चेहरे पर रखो नूर कि बारिश ..... The Joy...


चेहरे पर रखो नूर कि बारिश
और खयालों मैं खुशियों कि बूंदे
चंद लम्हों की मोहताज़ है, जिंदगी
किस ओर मुड़ जाये,
कभी ना जान पाओगे,

वक्त को किसने रोका है,
ये तो समय कि धारा है,
हर पल जो आता,
ओर जब जाता है,
कभी ना जान पाओगे,

निकल कर बाहर अपने इस बिंब से,
आज कुछ ओस कि बूंदे चुनो,
अपनी सूखी हथेली को दो,
एक नव जीवन,
जो अब जान जाओगे,

चेहरे पर रखो नूर कि बारिश ।।।

(c):तुम्हारे मन की...जो मैने कही...

Monday, April 13, 2009

कुछ बातें अनकही रह जाती है.....The Wait


कुछ बातें अनकही रह जाती है,

कुछ बातें कभी नहीं कही जाती है,

जो तुम जान जाते,

वो बातें जो हम कह पाते,

तो ये उदासियाँ का होती इन राहों में ,

और न होते बदलते एहसास,

ना होते इस तरह खामोश हम,

और न होते इस तरह खामोश तुम,

मेरी सारी यादें, तेरी सारी कहानियां,

अब तो याद ना आएँगी,

अगर न रह जाती,

कुछ बाते अनकही,

कभी नहीं कही जाती है.......


c) :: तुम्हारे मन की...जो मैने कही... ::

Friday, April 10, 2009


जलते भुझते दीप..

रोज़ हवा से लड़ते,
थिरकती पवन,
मचलती लौ उनकी,
जैसे मचलता ये मन,
और दूर कहीं,
गाती हुई पवन,
यादों के झरोखो से,
झांकता ये मन.........

(c) :: तुम्हारे मन की...जो मैने कही... ::