तू और मैं, जैसे समनांतर रेखायें,
जो, इक तल में,
और इक ही तो दिशा में,
चलती है,
हाँ,
नदी के किनारे भी तो साथ ही चलते है,
अपने आंचल मैं,
लहरों को भरते है,
पर,
कुछ बात अलग सी है,
कुछ तो इनकी दूरी भी तो है,
समान रास्तों से,
मनज़िलें कहां मिलती है,
वैसे भी,
समनांतर रेखायें कभी नही मिलती है।।
(c)तुम्हारे मन की...जो मैने कही...